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पिछले कई वर्षो से - वेब सीरीज और मूवीज देखने पर पाया की इनमें असभ्य शब्दों का प्रयोग कुछ अधिक ही बढ़ गया है.... बॉलीवुड फिल्मों ने भी कंटेंट, प्रोडक्शन और प्रस्तुति में बड़ा बदलाव किया है, edgy cinema की तरफ रुझान बढ़ा है ।


पूर्व काल में ऐसा नहीं था, या यूं कहें कि निर्देशकों को, लेखकों को, ऐसी कोई आवश्यकता ही नहीं थी कि इस प्रकार की भाषा या शब्दों का प्रयोग करे ( I mean to say abusing words ) 


अब शुरुआत कहा से हूई यह कहना मुश्किल है, विदेशी विचारधारा है या हमने ही जन्म दिया । यूथ की डिमांड को ध्यान में रखा जा रहा है, या उनकी मनोवृति ऐसी बनाई जा रही है कि बस यही पसंद करे, ऐसे शब्द सुनकर आंनद ले । वैसे कुछ भी कह लो फर्क तो पड़ता है मानसिकता पर, जीवन पर, फिर अच्छा या बुरा तय करना तो दर्शक के हाथ में है ।


अब देखिए लॉक डाउन के दौरान महाभारत, रामायण फिर से चलाई गई तो, सभी इतनी सभ्य भाषा में विडियोज बनाने लगे जैसे बस अपनी मूल भाषा को, संस्कारों को आज ही जान लिया हो प्रनिपात, भाताश्री, आज्ञा, प्रस्थान ना जाने कितने ही ऐसे शब्द है जिनका अर्थ भी नहीं जानते होंगे हम... चलो चाहे दिखाने के लिए ही बनाए गए हों । फर्क तो पड़ा ही....


आजकल कुछ भी सपरिवार बैठ कर देख पाना सभ्य प्रतीत नहीं होता, हा हो सकता है सब को ऐसा ना लगता हो पर खुले विचारों और सोच को परिवर्तित कर देने मात्र से परिणाम अच्छे नहीं हो जाते । अब विकास हो रहा है या अवनति ये तो आप भी सोच सकते है । 


इस प्रकार के कॉन्टेंट की आसानी से उपलब्धता भी यूथ को भटका रही है, आज कल यूथ इस प्रकार की विचारधारा का शिकार हो रहे है, उन्हे ऐसा लगने लगा है की वे अगर इनके पक्ष में नहीं होंगे तो, उन्हे पिछड़ा हुआ माना जायेगा । जबकि ऐसा नहीं है, पिछड़े हुए लोग अब बन रहे है । जिनमें व्यावहारिकता की समझ ही नही है, 


जिनमें प्रैक्टिकल नॉलेज नही है, सारी सुख सुविधाएं मिल जाने मात्र से ज्ञान नहीं मिल जाता, ज्ञान तो वही होता है जो अर्जित किया जाता है, और इन सब से ज्ञान हासिल होना भी नहीं है । फिर भी ना जाने क्यों हम इसका विरोध नही कर रहे । हम क्यू नही देख पा रहे की हम आने वाली पीढ़ी को ही खराब कर रहे है । 


इन सब को अपना कर हम मर्यादा खो रहे है, सबकी जुबां पर रहने भी लगे है असंस्कृत शब्द, सोचते होंगे वो लोग भी की इनका उपयोग नहीं किया तो ना जाने क्या बदल जाएगा, कोई इन्हे सुनना पसंद नहीं करेगा या कोई देखना पसंद नहीं करेगा। ना जाने क्या हासिल होता है ऐसी भाषा से, जिसे कुछ लोग इतना पसंद भी करते है । वैसे लोगो के रुझान को देख कर ही निर्माता इस प्रकार के प्रयोगों में निरन्तर लगे हुए है, इसे भाषा की अपवित्रता कहना भी गलत नहीं होगा ।


शायद हम कुछ कहते नहीं तो इसका अर्थ यही है कि, इस प्रकार के कंटेंट हमे देखने को मिलते रहेंगे ।



  1. पर आनंद तो उसी में आता है.... जो हमारा सत्य है हमने अपनाया नहीं है, किसी दूसरी विचारधारा को ग्रहण नहीं किया, अपनी सोच को भटकाया नहीं है । जिन शब्दों को सुनकर बस मन खुश हो जाता है, सुकून मिलता है, ऐसे छंद, उपनिषद्, काव्य ग्रंथ आदी रूपी खज़ाना मिला है हमें जिन्हे हम समझ पाए, ग्रहण कर पाए तो कहीं भटकने की आवश्यकता ही नहीं है । ऐसा लगता है मानों जैसे वाकई में अपनी सभ्यता को समझते है हम.... सम्मान करते है, जैसे हम उसी युग से आए हो जो अपनी संस्कृति और भाषा के प्रयोग से जाना जाता है और जाना जाता रहेगा, चाहे हम देखे या ना देखे । 


बस जरूरत है भाषा की सकारात्मकता, पवित्रता बनाए रखने की ।


Tags: Opinion Edgy Cinema Human Life khushiia Article


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